Wednesday, 30 July 2008

क़हक़हे का अर्थ रुदन भी होता है

एक दिन पुरुष ने क़हक़हा लगाया।

कहते हैं कि संप्रेषणीयता का नियम होता है कि जो जैसे कहा जाए, वैसे ही सुना जाए और समझा भी जाए। इस मामले में पुरुष की संप्रेषणीयता कमज़ोर थी। वह अपना क़हक़हा ख़ुद नहीं समझ पाता था। उसे लगता था कि उसने क़हक़हा लगाया है, लेकिन ख़ुद उसे वह किसी दारुण रुदन की तरह सुनाई देता था।

जब पहली बार स्‍त्री ने उसका क़हक़हा सुना, तो वह चौंक गई। उसने पूछना चाहा कि तुम किस बात पर यूं हंस रहे हो, पर यहीं पर पता चला कि स्‍त्री भी संप्रेषणीय नहीं रह पाई थी। वह मुंह खोलती थी और ध्‍वनि अपनी श्रव्‍यता खो देती थी। उसकी ज़ुबान पर एक जोड़ी कान रहते थे, वे ख़ुद उसका पूछना सुन लेते थे लेकिन पुरुष उसे सवाल की तरह नहीं सुन पाया था। उसने सवाल को एक फूंक की तरह सुना और अपने क़हक़हे के अर्थों में इस तरह खो गया, जैसे किसी ज़माने में एक राजा, एक ऋषिकन्‍या को दी गई अंगूठी के खोने में रहता था।

इस तरह देखा जाए, तो जैसे अंगूठी खो गई थी और अंगूठी के खोने से दो लोगों के बीच का प्रेम पतेदार रहते हुए भी लापता हो गया था, उसी तरह क़हक़हे लगाता एक पुरुष, क़हक़हे का अर्थ खो जाने से ख़ुद भी खो गया था।

उन दिनों हवा सचमुच बेहद मेहरबान थी और ईमानदारी से कहे गए शब्‍दों को ठीक उनके मूल स्‍वरूप में ही यहां से वहां बहाकर ले जाती थी। उन दिनों बारिश भी बहुत ईमानदार थी और आसमान से दूब तक के अपने सफ़र के दरमियान आए शब्‍दों को कभी इस तरह नहीं घिसती थी कि वे घिसे हुए शब्‍दों की अभिशप्‍त पहचान के साथ जीवित रहें।

तो बहती हुई हवा पुरुष के उस क़हक़हे को बहाकर ले गई और बहुत सारे दूसरे अदृश्‍य लोग, जो उनके हवाघर के आसपास ही रहते थे, वे हवा से बने हुए दरवाज़ों पर दस्‍तक देने लगे। उस स्‍त्री ने हवा से बनी कुंडी हटाकर हवा से बना दरवाज़ा खोला, तो उन अदृश्‍य लोगों ने उससे पूछा कि पुरुष इतने ज़ोर-ज़ोर से क्‍यों भला रो रहा है?

उसने कहा कि नहीं, पुरुष तो क़हक़हे लगा रहा है, लेकिन उसकी यह बात भी संप्रेषणीय नहीं रही। अदृश्‍य लोगों ने अपने अदृश्‍य कानों से उसे भी फूंक की आवाज़ की तरह सुना और वे डर गए कि स्‍त्री फूंक कर टोना कर देती है। वे रोष में आ गए और स्‍त्री के बाल पकड़कर उसे टोनहिन कहते हुए पीटना चाहते थे।

पुरुष अपने क़हक़हों में मुब्तिला था और दरवाज़े पर खड़ी स्‍त्री अदृश्‍य इरादों से कांप रही थी। इतने में किसी अदृश्‍य हाथ ने कमर के नीचे तक लहराने वाले बालों को पकड़ उसे घसीटा। उसने डरकर जो चीख़ मारी, वह भी एक फूंक में बदल गई। उस स्‍त्री की हर आवाज़ फूंक में बदल जाती। वह संप्रेषणीयता के नियम की तानाशाही थी। वांछित था कि हर शब्‍द को उसी के अर्थों में समझा जाए। न थोड़ा दाएं, न थोड़ा बाएं। संप्रेषणीयता के नियम की बही में स्‍त्री के आगे अंग्रेज़ी में एफ़ लिखा गया था, जिसका फुल फॉर्म फ़ीमेल नहीं, फ़ेल संप्रेषित होना चाहिए।

स्‍त्री द्वार पर आंत दाब कर रोती रही और उसके रोने की आवाज़ फूंक की आवाज़ सी सुनाई दे रही थी।

अचानक उसे पुकारता हुआ पुरुष द्वार पर आया। वह अंगूठी के खोने पर फि़क्र जता रहा था और उसके खोने में उन दोनों के खोने को रोक देना चाहता था।

क़हक़हे की आवाज़ अब रुदन की आवाज़ के रूप में संप्रेषित हो रही थी।

Friday, 25 July 2008

छत नहीं थी, छत की ख़ाली जगह बची थी


- तुम्हारी भाषा में गाल को क्या कहते हैं?
- गाल को? हम्म्म्... होंठ कहते हैं।
- तो फिर आंख को नाक कहते होंगे?
- नहीं जी, आंख को तो घर कहते हैं।
- अच्छा?
- हां जी। आंख में रहा जाता है। सपना बनकर, आंसू बनकर, बादल बनकर... और किरकिरी बनकर।
- और घर का दरवाज़ा? जो कभी वह बंद हो गया तो?
- जो बाहर से बंद हो गया, तो समझो, भीतर वाले कहीं और रहने चले गए।
- और भीतर से बंद हो गया तो?
- तो समझो, भीतर वालों को अब कहीं नहीं जाना, कभी भी। बंद दरवाज़े के भीतर वे हमेशा साथ-साथ रहने वाले हैं।
- आंख के भीतर दीवार रहती है?
- दीवार में एक खिड़की भी रहती है।
- खिड़की से कौन झांकता है?
- वह हवा, जो दीवार के उस पार रहती है।
- वह हवा वहां से हट गई तो?
- उस हवा की ख़ाली जगह वहां से कभी न हटेगी।
- ख़ाली जगह इंतज़ार करती रहेगी।
- इंतज़ार क्या है? एक बारिश ही तो है।
- और बारिश ईमानदार न हुई तो?
- तो वह एक पेड़ बन जाएगी, जिस पर कभी सचमुच की बारिश न हुई हो। जो एक बड़ा छत जैसा सिर लिए निपट अंधेरे में ख़ुद पर शाप की तरह बरसती गरमी झेलेगा।
- हवा से उसका काम न चलेगा?
- हवा तो कब की हट चुकी होगी।
- तो उसका क्या होगा, जिसका घर हवा में है?
- वे बेदरो-दीवार सा एक घर बनाएंगे, जहां कोई हमसाया न होगा, पासबां भी नहीं होगा।
- हवा तो उसमें भी चाहिए होगी?
- हम्म... मैं एक फूंक मारूंगा, जिससे तेरे कानों के बूंदें हिलेंगे और उस हवा से और हवा बन जाएगी।

स्त्री ने अपने कान को उंगली से स्पर्श किया। जैसे ट्रॉय की हेलेन ने छुआ था। जैसे एक पुच्छल तारे ने चांद को छुआ था और दुखी होकर अपने बदन से रोशनी छीलकर फेंक दी थी। जैसे लाजवंती घास ने बग़ल से गुज़रती चुन्नी को छुआ था और हमेशा के लिए अपनी सकुचाहट में खो गई थी।
स्त्री ने जाने कब से बूंदे नहीं पहने थे।
और उसके बाद वह चुप हो गया। स्त्री चीज़ों को जोड़कर रखना चाहती थी, पुरुष किसी नए इतिहास के लेखन के लिए बार-बार क़लम की निब घिस रहा था।
स्त्री ने पूछा- हमारे घर की छत कहां गई?
- किसी थके हुए फेफड़े को दान कर दी। वह सांस ले-लेकर थक चुके थे। छत की हवा किसी को जीवन दे रही है।
स्त्री सीढ़ी चढ़ते हुए हांफ रही थी और छत के बाद बची हुई, छत की ख़ाली जगह को देख रही थी।

Wednesday, 18 June 2008

श्‍वास, विश्‍वास और महीने का एक दिन

ऐसा हमेशा से होता आ रहा था। महीने में एक ख़ास दिन, ख़ास वक़्त पर वे अपने सारे दुख-दर्द भूल जाते, इस दिन सूरज-चांद अपने पांव मोड़कर सुस्ताने बैठ जाते और सातवें आसमान से ज़रा ऊपर, बेघर भटक रहे वे दोनों नीम अंधेरा देखकर ज़मीन की ज़द तक आ जाया करते थे। सबसे चमकीला तारा उठाकर पुरुष, स्त्री के माथे पर टांक दिया करता और सबसे गाढ़े बादल का सुरमा उसकी आंख में खुद लगा देता था। इस दिन का इंतजार वे पूरे महीने करते थे। पुरुष के बाएं कंधे पर घंटों सिर टिकाए बैठी रहती स्त्री को देर तक अपनी मांग में गीलापन महसूस होता जो पुरुष की आंखों से रिसकर वहां तक पहुंचता था। इन पलों में प्रवेश करने से पहले वे सारे दुख और पीड़ा को आसमान की सबसे ऊंची अलगनी पर टांग देते थे और गाली कभी इस वक्त उनके बीच आने का दुस्साहस न कर पाती।

इसी रात ज़मीन पर भी उत्सव मनाया जाता। किसी को पता नहीं था कि इसकी शुरुआत कैसे और कब हुई लेकिन किंवतंदियों से पता चला था कि जब सूरज और चांद थककर सांस लेने बैठें और आकाश का सबसे चमकीला तारा अपनी जगह पर न दिखे तो, देर रात तक घरों से बाहर निकलकर लोगों को नाचते-गाते प्रार्थना-गीत गाने चाहिए। धरती के हरी-भरी और प्रेम से परिपूर्ण रहने की दुआ इस रात कुबूल की जाती है, ऐसा कहा करते थे बुजुर्ग। दुनिया को ज़रूरत थी प्रेम के एक प्रतीक की, जो इन दुआओं के जरिए ही धरती तक उतरने वाला था। नाचते-गाते लोगों की दुआ जब भी उनके पास से होकर गुज़रती, उनके हाथों की पकड़ और कड़ी हो जाया करती। इस पकड़ पर बहुत विश्वास था उन्हें। वे एक दूसरे से पूछते-कहां रहता है विश्वास.... और फिर साथ-साथ दोहराते-हाथ की इस पकड़ में, हथेली के तिल में, आंख की गीली कोरों में और......... और आत्मा में छिपी उस आधी बूंद में। पर, बूंद तो दिखती नहीं, आत्मा तो बेशक्ल है, पहचानेंगे कैसे, एक के शुबहे को दूजा हमेशा ये कहकर शांत किया करता-आंख की गीली कोर तो दिखती है न....हथेली का तिल भी, कैसे भूल जाएंगे फिर........। इससे ज्यादा सवाल-जवाब की गुंजाइश उनके बीच कभी बनी ही नहीं।

उनका विश्वास अटल था लेकिन इधर गाली ने अपना कुनबा बढ़ा लिया था। उसे अब अपने रहने के लिए ज्यादा जगह चाहिए थी। इतनी- कि कभी-कभी उन दोनों के खुले हाथ भी एक दूसरे को छू न पाएं। उसका सबसे क़रीबी नातेदार झूठ था। जैसे गाली ने पुरुष को छला था, झूठ ने स्त्री को बहका लिया था। वे जब भी इनके कहे में आते, हाथों की पकड़ ढीली पड़ जाती और वे दूर होने लगते। पहली बार जब ऐसा हुआ तो वे बेहद डर गए थे। लेकिन इसके बाद जब भी ऐसा होता वे समझ जाते कि कुछ देर दूर रहने का वक़्त आ गया है। वे दोनों साथ रहते लेकिन इस बारे में कभी कुछ न कहते। यहां तक कि उस दूरी के बारे में भी बात न कर पाते जो उनके बीच हर दिन बढ़ रही थी। वे हमेशा एक-दूसरे से कहते कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और इस विश्‍वास को सांस की तरह सीने में उतार देते. जिन पलों में सांस रुकी हुई होती, हवा का कोई अता-पता न होता, उन पलों में यही विश्‍वास नासिका में यात्रा करता, उन्‍हें हवा का पता बताते हुए. उस हवा का, जहां उन्‍होंने एक घर बनाया था.

Sunday, 1 June 2008

दो की तरह बनाना और तीन की तरह बिखर जाना...

...ईश्वर ने नूर की एक बूंद को आधा-आधा रोपा था उनकी रूह में। इस बूंद के आधेपन की ख़ातिर वे पूरे के पूरे एक-दूसरे में रहने लगे थे। धीरे-धीरे उन्हें पता चला कि वे बने ही एक दूसरे के लिए हैं। बूंद बहुत चमकदार थी, अपनी उजास से उन दोनों के वजूद रोशन रखती। वे अगर कहीं अलग हो जाते तो ये उजास दूर से ही बता देती थी उनके जाने की दिशा। वे ज़्यादा देर, ज़्यादा दूर रह नहीं पाते थे। नूर की बूंद इतनी दुबली थी कि दो फांकों में रहे, तो अंधेरा उसे निगल जाए। और इतनी मज़बूत थी कि कई अंधेरी रातों को मशालों के मुंह में झोंक दे।

लेकिन ये बात उनके बेघर होने से पहले की है। तब हवाघर था और वे दोनों भी थे एक दूसरे में सुख से रहते हुए। ज़मीन से उठी चिंगारियों ने जब से उनका घर जलाया, तब से वे दोनों एक दूसरे में नहीं, एक दूसरे के साथ रहने लगे थे। चिंगारियों के साथ ही एक गाली उछलकर उनके बीच आई थी। एक ने गाली दी थी तो दूसरे ने ले ली थी। मना कर सकने की सारी संभावनाओं के बावजूद लेकर रख लिया था उसे। वो गाली अब वापस जाने का नाम नहीं लेती थी, उनके साथ रहने लगी थी पूरे वज़न और मायनों सहित। उसने उन दोनों के बीच एक जगह बना ली थी अपने रहने के लिए।

जला हुआ घर हवा में तैरता था इस उम्मीद से, कि आज नहीं तो कल उसके काले हो गए फ़र्श को बादल भर बारिश से धो दिया जाएगा, अधजली छत को चांदनी से एकसार कर पाट दिया जाएगा, हवा की खिड़कियां उनकी तरफ़ देखतीं और सोचती कि किस दिन वे दोनों आकर वहां एक गहरी सांस लेंगे और अपनी उसांस से वहां जमी राख को उड़ा देंगे । फिर यहां से झांककर पूरी रात ज़मीन की तरफ़ देखते हुए कुछ बहुत पुराने गीत गाएंगे और सनातन उदासियां वैसे ही उड़ जाएंगी, जैसे भाप बनकर पानी। आसमान के सीने पर होंठ की फांक के निशान की तरह चस्‍पा इंद्रधनुष अक्सर उनसे पूछना चाहता- इस सिरे से उस सिरे तक तैरकर झूलना नहीं है क्या...? वो अपने रंगों को और चटख़ कर लेता कि इस बहाने ही सही वे इधर देखेंगे तो...। लेकिन वे किसी की तरफ़ नहीं देखते थे। क्या हो गया था उन्हें?

सबकी उम्मीद उनपर थी लेकिन वे एक दूसरे से नाउम्मीद हो चुके थे। वे जब भी एक दूसरे की तरफ़ देखने की कोशिश करते, गीली आंखों में गाली आकर बैठ जाती और फिर कुछ कहने की गुंजाइश ही न बचती। वे जब भी एक दूसरे में रहने की कोशिश करते, गाली साथ हो लेती और वे वापस हो जाते। वे दो की तरह उस घर को बनाने के लिए बार-बार दरो-दीवार चुनते और तीन की तरह बिखेर देते। घर किसी तरह बनने में नहीं आ रहा था। उनकी हथेलियों में हज़ार छेद हो गए थे, इसीलिए उनमें कुछ टिकता ही नहीं था।
वे एक दूसरे के साथ नहीं, एक दूसरे में रहना चाहते थे, पहले की तरह। लेकिन वे अब दो इंसानों से ज़्यादा एक स्त्री और एक पुरुष थे। पुरुष उसे हमेशा अपनी बाईं तरफ़ रखता था। हाथ में हाथ डाले वे चुपचाप हवा में तैरते थे, हाथ की पकड़ ऐसी थी कि एक की हथेली के तिल का निशान दूसरे की हथेली में उग आया था। वे अपने घर को बहुत याद करते, और जब भी रोते, तो नमकीन-सी बरसात होती। होती ही रहती। ज़मीन पर रहने वाली दुनिया और साइंसदां किस्‍म के लोग उस बरसात के पानी को पोखरों-तालाबों में जमा करने की जुगतें भिड़ाते, मासूम-से बच्‍चे उस बरसात में पानी-पानी खेलते, सयाने उसके पानी से अपने काम की कोई न कोई फ़सल उगाने लग जाते। कोई बारिश की उस गंगोत्री की तरफ़ झांक कर नहीं देखना चाहता था, जो दो जोड़ी आंखों से बही आ रही है। उल्‍टे, सब किसी न किसी देवता के हाथ जोड़कर कहते कि ये बारिश ऐसे ही होती रहे।

वे दोनों चाहते हैं कि बारिश रुक जाए, पर क्‍या इस बारिश का रुकना दुनिया की दुआ के खि़लाफ़ चला जाएगा?

Sunday, 11 May 2008

एक घर, जो हवा में तैरता है

जब वो घर था, तब दुनिया में कुछ नहीं था। न सड़कें थीं, न कारख़ाने, न चौराहे थे, न लोग। दुनिया में कोई हिमालय नहीं था, कोई समंदर भी नहीं. कोई आग नहीं थी, कोई पानी नहीं. तब कोई भाषा भी नहीं थी. सिर्फ़ दो लोग थे। उन दोनों ने रहने के लिए एक घर बनाया था, जिसकी दीवार हवा की थी। छत हवा की थी। फ़र्श भी हवा की। हवा की दीवार में से थोड़ी-सी हवा निकाल कर उन दोनों ने हवा की एक खिड़की बना दी थी। इसी तरह हवा का एक दरवाज़ा। उन दोनों के पास कोई भाषा भी नहीं थी। गूं-गूं करती कोई आवाज़ थी। वह आवाज़ भी एक घर ही थी, जिसमें वे दोनों वैसे ही रहते थे, जैसे बेदरो-दीवार के उस हवाघर में. वहां कभी घुटन नहीं होती थी. हर वक़्त हवा आती थी. जाती भी थी.

एक दिन भाषा बन गई। भाषा में सबसे पहले प्रार्थना ईजाद नहीं हुई थी। यह हमारी ग़लतफ़हमी है। भाषा में सबसे पहले नफ़रत और गाली ईजाद हुई। किसी विचारक ने कहा था कि भाषा में सबसे पहले प्रेम के लिए शब्‍द खोजा गया था. ग़लत था वह विचारक. प्रेम को भाषा की ज़रूरत थी ही नहीं.

तो भाषा में सबसे पहले गाली आई, जो साफ़ तौर पर एक स्‍त्री को दी गई थी। फिर दुनिया फलने-फूलने लगी। फिर समंदर बना। फिर हिमालय. फिर दर्रे. घाटियां. झाडियां और फूल. कांटे भी साथ-साथ ही बने. सड़कें बनीं. इमारतें भी. उनसे पहले थोड़ी सी आग भी बन गई थी. वह दो पत्‍थरों के बीच रहती थी और तभी दिखती थी, जब पत्‍थर आपस में लड़ पड़ें. फिर बहुत सारे लोग भी बन गए। वे पत्‍थरों की तरह कई बार लड़ पड़ते थे और आग पैदा करते थे।

वे दोनों चुप अपने हवाघर में रहते थे। किसी समय लोग आपस में पत्‍थरों की लड़ पड़े, जिससे आग पैदा हो गई। चिंगारियां उस हवाघर पर पड़ीं और वह जलने लगा। हवा की दीवार, हवा की खिड़की, हवा की छत, हवा की फ़र्श, सब जलने लगे। हवा का वह घर जल गया। हवा में ही बचा हुआ है अब। वे दोनों उसमें रहते थे, अब बेघर होकर भटकते हैं। न वह घर किसी को दिखता है, न उसमें रहने वाले वे दोनों। कहते हैं, हवा हो जाने का मतलब कभी दिखाई न पड़ना है।

पर मुझे अब भी अपने आसपास ही दिखता है हवा का वह घर। हवा जैसे वो दोनों रहने वाले। आंखों पर पानी का परदा चढ़ाकर देखें, तो शायद आपको भी दिख जाएंगे वे दोनों. और हवा में तैरता उनका एक घर. दिख रहे हैं न?