Friday, 28 August, 2009

तू नहीं तुम.....;तुम नहीं आप

 प्रेम को भाषा की ज़रूरत थी ही नहीं....ऐसा इतिहास में दर्ज था...अब भाषा ज़रूरी हो गई थी । बहुत मेहनत से पुरुष नई भाषा ईजाद कर रहा था। उसके निपट प्रेमी से भाषा विज्ञानी हो जाने का भेद दोनों पर ही अब खुला था। हर दिन वह नया शब्‍द गढ़ता,  उसका अर्थ बनाता,  नोक-पलक दुरुस्‍त करता और करीने से सजाकर रख देता। परंपराओं के पीछे भागते हुए पुरानी और घिसी-पिटी शब्‍दावली का इस्‍तेमाल करने के पक्ष में वो बिल्‍कुल नहीं था जबकि स्‍त्री  पुरातन प्रिय थी। वह तर्क देती-सदियों से कई दुनियाओं में गूंजते  घिसकर चपटे और आकारहीन हुए शब्‍द कुरूप होने पर भी  परखे हुए, अर्थों में खरे उतरे हुए सच्‍चे शब्‍द हैं...। पुरुष हर उस शब्‍द को ख़ारिज करके आगे बढ़ रहा था जिसका इस्‍तेमाल दुनिया के लोग धड़ल्‍ले से करते....वो पुरातन का विरोधी था।

यानी अब स्‍त्री के लिए यह भाषा सीखना लाज़मी था.... पुरुष से बात कर सकने के लिए एक यही एक पुल शेष था।  वो सीखती और भूल जाती...बार-बार यही हो रहा था। एक दिन अपने बाएं कंधे से स्‍त्री का सिर हटाकर पुरुष ने झोला लटका लिया....शब्‍दों को सुरक्षित रख सकने के लिए। बोझ बढ़ रहा था...ज़रूरत थी एक ऐसी किताब की जिसमें वे सारे शब्‍द अपने अर्थ के साथ जाकर आराम से बैठ जाएं। ज़रूरत पड़ने पर बाअदब आकर हाजि़र हों और कभी गुस्‍ताख्‍़ाी  न करें अर्थ में गड़बड़ी की। 

परीक्षा के दिन थे। स्‍त्री के लिए उन शब्‍दों के इस्‍तेमाल में सबसे बड़ी परेशानी उनका बेहद ठंडा और सख्‍़त होना था। जैसे तू और तुम की जगह आप जैसा सुथरा और नुकीला शब्‍द रखते हुए पुरुष ने गर्व से उसकी ओर देखा लेकिन वह सिर्फ़ इतना ही सोच सकी कि उन दोनों के बीच का फा़सला अचानक इतना बढ़ क्‍यों गया....। वह शब्‍द की गढ़न पर मुग्‍ध होता फिर उसे डाल लेता अपने झोले में।  झोले का वज़न उसे संतोष देता था उस उपलब्धि का जिसमें वह किसी और दुनिया का सा महसूस करता। दरअसल एक विदेश बन चुका था उन दोनों के बीच....भाषा का ही नहीं भाव का भी।  पुरुष ने नई ज़बान में उससे सवाल पूछ रहा था और वह चुप होकर दूसरी तरफ देखने लगी,  जैसे ये सब उसके लिए था ही नहीं।  
तो किसके लिए था यह सब.........कौन था जो पुरुष की इस भाषा को समझता था, कौन था जो उसे पुकार रहा था इस भाषा के व्‍याकरण को तरतीब देने और विज्ञान को लिपिबद़ध कर देने के लिए, जवाब ढूंढना अब पुरुष के लिए भी ज़रूरी हो गया था।

Tuesday, 27 January, 2009

...तो ये जनम ज़ाया हो जाता

कई मुहूर्त हवा का द्वार खटखटा कर चले गए...कई मौसम अपनी गुमशुदगी के अभिशाप को तोड़ देने की गुज़ारिश करते-करते रह गए ..कई सदियां गुज़र गई थीं....पुरुष को पथराए हुए। न जाने कब से स्‍त्री उसकी ओर एकटक देख रही थी बिना थके....बिना रुके...बिना यह कहे कि वो दिन भी आ-आकर लौटते हुए थकने लगा है जिसमें गुंथा हुआ एक ख़ास पल उनके दुख-सुख हर लेने के लिए अब भी आया करता है। वह उस पल में प्रवेश करने का इंतज़ार कर रही थी जबकि पुरुष की भुलभुलैया कुछ और थी !  .वह खोया था अपनी ही हथेलियों पर बिछे अनिश्‍चय के जाल में...जिसमें खिंची एक नई रेखा बार-बार उसके विश्‍वास को हिला रही थी....भरी आंखों से उसे अक्‍सर अब वो तिल धुंधला नज़र आता था जो स्‍त्री की हथेली के तिल का जुड़वां था..।

 कौन था...जो जान सकता था इस प्रेम के रहस्‍य को...और कौन था जो साक्षी बनकर बता सकता कि उन दोनों को एक दूसरे के लिए ही बनाया गया है....सिवाय उस पल के जिससे पुरुष बेपरवाह हो चला था....। असंख्‍य अंधेरों को कूटकर रची गई एक अमावस की रात पुरुष ने सहमकर स्‍त्री से कहा-पता है, तुम्‍हारा साथ न मिलता तो क्‍या होता.....स्‍त्री की आंखें हमेशा की तरह उस आवाज़ को सोख लेने के लिए  सूखी  थीं..पूछ बैठी... क्‍या होता...? पुरुष ने हथेली में उग आई नई लकीर को टटोला और कहा-साथ न मिलता तो तुम्‍हारे‍ बिना ये जनम ज़ाया हो जाता....। सवांद अधूरा था... लेकिन पूरा होने से कहीं ज्‍़यादा अर्थपूर्ण और इतना पवित्र कि इसे सुन रहा वह पल अपने उस फै़सले को स्‍थगित कर बैठा जिसमें आगे से कभी उन दोनों तक आकर द्वार न खटखटाने का संकल्‍प था...। वो पल एक बार फिर लौट चला था लेकिन नाउम्‍मीद होकर नहीं... बल्कि आश्‍ वस्‍त होकर फिर से आने के लिए। जाते हुए उसने सबसे काली अमावस की दवात में एक उंगली डुबोकर उनके माथे पर एक टीका लगा दिया यह सोचकर,  कि अब कभी इस प्रेम को कोई काली नज़र न छू सकेगी....।

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उन्‍हें जाने दो
एक के बाद एक
सूर्य, तारे
विपुल प्रथ्‍वी,
सयाना आकाश,
अबोध फूल।

मुझे रहने दो
अपने अंधरे शून्‍य में
अपने शब्‍दों के मौन में,
अपने होने की निराशा में।

मुझे रहने दो उपस्थित
आखि़री अनुपस्थिति में।
                         
अशोक वाजपेयी