Tuesday, 21 October, 2008

क्‍या कहकर पुकारूं?


मौसम कहीं चले गए थे। बहुत दिन से उनकी कोई ख़बर नहीं। बिना बताए ही निकल गए। एक बार पलटकर कहा भी नहीं कि रोक लो हमें, बाद में ढूंढ़ न पाओगे। अब क्या कहकर उन्हें लौट आने के लिए आवाज़ लगाई जाए... दोनों को ही नहीं पता। कभी पूछे ही नहीं थे मौसमों के नाम। कोई अगर कह दे मौसम... मतलब क्या...? तो जवाब में उनके पास बताने के लिए बस इतना ही था कि वे हल्के कुनकुने से ख़रगोशी मुलामियत वाले दिनों की बात कर रहे हैं ...या उन रातों को ढूंढ़ रहे हैं जिसकी पीठ पर गाढ़े और ठंडे कोहरे की लामबंदी एक गट्ठर की शक्ल में नज़र आती थी.. या फिर वो दुपहरियां जिनमें हर तरफ छांव का छलावा डोलता फिरता। या कुछ ऐसे दिन भी, जिनमें गीले मन पर सतरंगी धनुष खिंचे नज़र आते थे। पहचान के लिए एक से ज़्यादा निशानियां थीं, लेकिन इस सबसे मौसम लौटने वाले नहीं थे। उन्हें वही पुकार चाहिए थी, जिसमें उनका नाम गूंजे।

पुरुष का तर्क था- नाम पूछना औपचारिकता है.. और हर औपचारिकता झूठ पर टिकी होती है। स्त्री ने उसकी बात पर कभी सवाल उठाया ही नहीं, तो भला मौसमों के नाम कौन पूछता और पूछकर करता भी क्या। वह कहता- बात सिर्फ़ अहसास की है, जिसे नाम नहीं दिया जा सकता, जब नाम दिया ही नहीं जा सकता, तो रखा कैसे जा सकता है, और रख भी लिया, तो क्या वह उस अहसास का पूरा और सही अनुवाद सामने रख पाता है... अक्सर स्त्री इन बातों को न समझते हुए भी हां में सिर हिला दिया करती थी। एक लकीर पर चलना उसकी नियति थी... उससे ज़रा भी हटते ही अंदर से एक आवाज़ आती- कहां भटक गई.... पता है न तेरा रास्ता सीधा है....। अब इस रास्ते जैसे ही सीधे-सपाट दिन सामने नज़र आते थे। सारे अहसास मौसमों के साथ गुमशुदगी में थे और इसकी जि़म्मेदारी किस पर आयद हो.... पता नहीं था।

पुरुष मौसमों की चिंता में गुम था और स्त्री के सिर एक और दुख आन पड़ा था। वह दिन रात घुल रही थी इस सोच में कि उन्हें तो एक-दूसरे का नाम भी नहीं पता.... अगर किसी दिन मौसम की तरह पुरुष उठकर चल दिया, तो क्या कहकर आवाज़ देगी उसे... जिन निशानियों की बात पुरुष किया करता है, वे तो पास आने पर ही दिखती हैं न... दूर से बुलाना हो तो क्या कहेगी वह...। और अगर दुर्भाग्य से स्त्री ही किसी दिन राह भटक गई, तो कैसे पुरुष आवाज़ देगा उसे....। वह तो यूं भी रात-दिन अपना घर बनाने के लिए अक्सर अकेले भटकती फिरती है। कितना अजीब था, एक उम्र बिना नाम के गुज़ार लेने के बाद अचानक नाम की ज़रूरत पड़ जाना...। नाम होने की औपचारिकता का न निभाया जाना, असुरक्षा के कुंए के बहुत पास जाकर रोकता था उसे... डूब जाने के बेहद क़रीब। वो डूबना नहीं चाहती थी... अकेले तो बिल्कुल ही नहीं।

अब उसे एक शुभ मुहुर्त ढूंढना था, जिसमें वे एक दूसरे के नाम रख सकें.....।

Wednesday, 15 October, 2008

चांद को पिघलाकर कान का फूल बनाना


अपने अंदर बने मौन के कुएं में वे एक शब्द छप्प से फेंकते और देर तक उससे बने वलय देखते रहते। जांचना जैसे ज़रूरी हो गया था कि शब्दों का सही अर्थ प्रतिध्वनित हो रहा है या नहीं। मानो एक गोपनीय प्रयोगशाला में परख लेने के बाद ही वे अब शब्दों को बाहर लाना चाहते हों। कितना अजीब था एक दूसरे की नज़र से बचने के लिए नहीं बल्कि ठीक से देख सकने के लिए आंख बंद कर लिया जाना। इन्हीं दिनों तो एक बार फिर आविष्कार किया था उन्होंने उस नूर की उस बूंद का जिसे ईश्वर ने उनकी आत्मा में आधा-आधा रोपा था। यही एक बात उन्हें बहुत सुख देती।

इसी सुख के बीच ऐन सिर पर आकर टंग गई पूरनमासी ने धीरे से आकर स्त्री के कान में रहस्य खोला- आज की रात सब कुछ मेरी चांदनी से धो लेना... सारा कलुष दूर हो जाएगा....। इतना उजलापन होगा जीवन में कि कभी किसी अंधेरे का साहस नहीं होगा पास फटकने का। यह अंधविश्वास था लेकिन स्त्री को इसे मान लेने में कोई उज्र न हुआ। उसने एक-एक करके वे सारे शब्द चांदनी में धो डाले जो उनके बीच सांझे थे और मैले होकर बहुत चुभते थे। उन सारी कामनाओं को एक बार फिर बाहर निकालकर चांदनी दिखा दी जो मन के कोनों में पड़े-पड़े अपना रंग-रूप खो रही थीं। उसे लगा इस बार पूरनमासी एक रात के लिए नहीं बल्कि पूरे जीवन के लिए आई है, प्रेम के चक्र को पूरा करती रिश्तों की पूरनमासी। ब्रह़मकमल इस बार खुलकर खिलखिलाए थे।

स्त्री सबकुछ उजला कर लेना चाहती थी तो पुरुष का कारीगर दिमाग़ इस चांदनी से एक ऐसा गहना गढ़ना चाह रहा था जो वो स्त्री को दे सके निशानी के तौर पर। उसने कहा- मैं एक पाज़ेब बनाता हूं....फिर कहा नहीं कंगन बनाना चाहिए....फिर सोचने लगा चोटी में गूंथ सकने लायक फूल ही क्यों न बना दूं....। उसका चित्त थिरता नही था और स्त्री ने सब पढ़ लिया था उसकी आंखों में। कहने लगी- तुम एक अंगूठी क्यों नहीं बनाते, मेरी अनामिका के लिए....? पुरुष को बात जंच गई लेकिन बनाते-बनाते उसका चंचल मन फिर बदला और वो बनाने बैठ गया ऐसे कर्णफूल जो चांदनी की सबसे उजली किरण को पिघलाकर गढे़ जाने थे।

स्त्री अपनी उंगलियां देखते हुए एक अंगूठी की कल्पना कर रही थी कि दमकते हुए कर्णफूल उसके कानों की लौ को छूने लगे...। हंसते हुए स्त्री ने पूछा- तुम याद रख सकोगे कर्णफूल और मुझे... पुरुष ने कहा- मैंने ही तो बनाए हैं, क्यों याद नहीं रखूंगा। अंगूठी तो इसलिए नहीं बनाई कि कहीं पानी पीते हुए वो उंगली से फिसलकर किसी मछली के पेट तक न पहुंच जाए...। कहते हुए उसकी आवाज़ इतनी पारदर्शी हो गई थी कि उसमें शामिल सारे सच्चे रंग दिप-दिप कर उठे थे.... इसी समय चांद को पहली बार लगा कि उससे ज्यादा चमकदार है यह प्रेम और हर पवित्रता से ज्यादा पवित्र है इसका रंग। पुरुष झूठ नहीं बोला था। उसे विश्वास था कि वो अपने किए प्रेम की तरह अपने गढ़े गहने को भी हमेशा, हर हाल में पहचान सकेगा....

Monday, 6 October, 2008

बहुत, मतलब बहुत...

चुप को चुपके से तोड़ देने की बात पहले किसके मन में आई....इसे लिखकर रखने की ज़रूरत नहीं थी। इतना समझ लेना काफ़ी था कि वे अपने बीच बीत चुके सदियों के मौन का कोई निशान बाक़ी नहीं रखना चाहते। सचमुच रस्सी का अस्तित्व महज़ उसे पकड़े रहने में ही तो था, सिरा हाथ से छूटा और उसके बाद पता ही न चला कि कहां गई वो अनिष्टकारी चुप। अब वहां आवाज़ थी शब्द-दर-शब्द...गूंज-दर-गूंज। आदिम बोल सच था और वो चुप टूट जाने वाला झूठ। उसकी अगवानी नहीं की गई थी तो विदा करने की जरू़रत भी नहीं पड़ी। पराजित कौन हुआ था....इस बहस से दूर स्त्री और पुरुष की चिंता अब उन अफ़वाहों पर थी जो पंख लगाए घूमतीं और कहतीं पतेदार प्रेम लापता हो गया....या फिर वे एक दूसरे के लिए बने होने के सच को भूल चुके हैं....।

पुरुष उसे समझाता- कुछ नहीं है ये सब.... सच सिर्फ़ हमारा एक दूसरे के पास होना है... सच सिर्फ वो तिल है जो इतनी दूर जाने पर भी अपनी जगह कायम रहा...सच आंख का वो गीलापन है जो सूख नहीं सका........सच सिर्फ़ वो आवाज़ है जिसे सुनकर मैं चुप नही रह सका...।
स्त्री उसकी बात मान लेती और सोचने लगती- अफ़वाहें भी चार दिन की हैं जैसे चुप की उम्र थोड़ी थी... राहत की एक नरम सांस उसे छूती और वह आंख बंद करके इस बात पर विश्वास करने लगती कि आज इस पल जो है वही सच है।

इस बात पर शुक्र मनाया जा सकता था कि आंख में बचे घर वाला दरवाजा़ न अंदर से बंद किया जा सका और न ही बाहर से उसपर ताला डाला गया... वहां रहने वाले वे दोनों अपनी शक्ल साफ़-साफ़ देखते हुए इस बात की तसल्ली कर सकते थे कि वहां कोई और कभी था ही नहीं। पुरुष टकटकी लगाकर उस माथे की तरफ़ देखते हुए एक बार फिर कहता चाहता था... यही है सृष्टि का सबसे सुंदर माथा....। यहीं वो सूर्य के डूब जाने और फिर से उग आने का रहस्य खोजता रहा है... लेकिन इससे पहले ही उधर से सवाल आ जाता- बताओ तो कितना सुंदर.... पुरुष के पास हमेशा से वो जवाब साबुत था सो झट से कहा- बहुत सुंदर... सवाल और मुखर होता....बहुत ? तब वो कहता- बहुत मतलब बहुत, फिर से मत पूछना। एक संगीत झन से बजता....शायद आत्मा का ही, ये शब्दों का अपव्यय नहीं था, बल्कि पूरा और कारगर इस्तेमाल कहा गया इसे।

युगों के बाद उस रात वे एक बार फिर अपने आंगन में हरा पौधा लगाने की बात करते-करते सो गए थे....। दूर गए क़दम लौटे थे या फिर सौभाग्य का वह सनातन चिन्ह जो उस माथे पर दोबारा उसी रात नज़र आया था....।

Wednesday, 17 September, 2008

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा

टूटी पलक को यूं ही ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता... रोक लिया जाता है गाल पर ही। उल्टी हथेली पर रख, आंख बंद करके एक दुआ मांगी जाती है और कभी किसी को बताया नहीं जाता कि मांगा क्या गया। लेकिन वे तो अपनी सारी दुआएं मिलकर ही मांगा करते थे, इसलिए एक दूसरे को न कह सकने की बात बीच में आ ही नहीं सकती थी। दुआ का विधान अपनी जगह क़ायम था और क़ुदरत ने इस बात को चाहते-न चाहते मान ही लिया था कि उन दोनो से कभी कोई एक दुआ दो हिस्सों में बंटकर उस तक नहीं आने वाली। इसीलिए उसकी बही में उनके नाम के आगे लिख दिया गया था- 'उनमें से जब भी कोई अकेले दुआ मांगेगा, तो वह आसमान और ज़मीन के बीच लटकी रह जाएगी। न पूरी होगी और न ही उसके पूरे न होने की ख़बर वापस उन तक भेजी जाएगी।' लेकिन इस बात को भूले बिना ही उन्होंने अलग-अलग दुआ मांगना शुरू कर दिया। दरअसल दुआएं भी बदल गई थीं। स्त्री चुप के टूट जाने की दुआ मांगती और पुरुष उस चुप को सहन कर सकने की शक्ति मांगता, सब्र मांगता.... जबकि दुआएं थीं कि उनके भूल जाने को सज़ा देती हुई ज़मीन और आसमान के बीच किसी बादल के सफ़ेद केशों में बरसों पुराने किसी गुलाब की तरह अटकी रहती.

अधर में वह चुप भी थी, जो उनके होठों के भीतर सिसक की गूंज बनकर रहती थी। कोहराम और चीख़-पुकार अब बाहर नहीं, अंदर ही घुटते थे। जिससे कभी-कभी ख़ुद उनके ही कान फटने लगते। उन्होंने अपने अंदर एकांत बो लिया था, ऐसा एकांत जो रात-दिन फैलता और उन्हें अकेला करता जाता। उतना ही अकेला जितना वह चांद था जो चुपचाप उनकी चुप्पी को देख रहा था। बिना आवाज़ के वो उन दोनों को समझा देना चाहता था कि अकेलेपन के पौधे को खाद-पानी मत दो, क्योंकि एक बार वह ख़ुद ऐसा करके आज तक अकेले रहने को अभिशप्त है। अकेलेपन को उससे ज़्यादा कोई नहीं जानता था। वे दोनों चांद की बात समझ रहे थे, लेकिन शायद वे भी अभिशप्त थे उस चुप और अकेलेपन को जीने के लिए, जिसमें हरपल गुज़र रहा था उनका।

उनके बीच की दूरी कितनी थी... जनम भर दौड़ते रहो तो भी पार न पा सको, और एक हल्की सी सरग़ोशी को जिंदा कर दो, तो एक झटके में ख़त्म हो जाए...। जितनी क़ुरबत... उतना ही फ़ासला। वे एक दूसरे की तरफ़ देखना भी चाहते, तो वहां कुछ न दिखता... सिवाय एक बिंदी के...। बिंदी अक्सर काली होती, कभी-कभार नारंगी और हरी भी। स्त्री काली बिंदी को अपशकुन मानती थी... पुरुष हर रंग की बिंदी के फलसफे पर किताब लिख सकता था। स्‍पर्श की अनिवार्यता के सिद्धांत को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए कुछ नया रचने की सोची थी। उनके बीच पांव फैलाकर निरदंद पसरे अकेलेपन को घुड़ककर भगा देने का पूरा साहस रखते हुए भी उसने पक्ष लिया था उसी का। ऐसा लगता था यहां कोई दुआ कभी काम नहीं आएगी।

वहां ज़रूरत थी एक आवाज़ की, जो अकेलेपन को निगल जाए, एक दुआ की, जो दो हिस्सों में नहीं, एक सुर में साबुत आसमान तक जाए, एक ईमानदार दुआ की, जो अधर में लटकी बाक़ी दुआओं से नज़रें बचाते हुए न चले, बल्कि पूरी सच्चाई से क़ुदरत तक पहुंच सके...

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?

Monday, 18 August, 2008

चुप की रस्‍सी के दो किनारे...अबोल,अडोल

कुछ बदल गया था। वो अपने चेहरे पर उंगलियां फिराकर देखता- आंख, नाक, माथा, भंवें, कान....सब तो अपनी जगह हैं। उसे विश्‍वास न आता, तो देर तक स्‍त्री की आंखों में देखता और खु़द से ही कहता-क्‍या बदला है, सब पहले जैसा ही तो है......। हां सब पहले जैसा ही है, वो खुद को समझा देता।  सहमी हुई स्‍त्री उलाहना देती तो वह कह देता-दिख रहा है न हाथ्‍ा का तिल और आंख की गीली कोर....सब वैसा ही है, पहले जैसा। कुछ नहीं बदला। ये कहते हुए अक्‍सर उसकी आवाज़ कांप जाती-उसके अंदर भी कुछ दरक रहा था एक अंदेशे से। वह सबकुछ बदल जाने से पहले ही उसे रोक देना चाहता था। लेकिन बदलाव चुपचाप आया था, बिना किसी को बताए। पुरुष घर का मुखिया था, सो आने की खबर पहले उसे ही लगी। और इसके बाद वह चुप हो गया, बिलकुल चुप। जबकि स्‍त्री अपने शोर में मगन थी पहले की तरह, इस उम्‍मीद पर कि उसने जो कहा है वही सच है।
एक की चुप और दूसरे का शोर.... उनके बीच ख़ूब बजता। देर रात ज्‍़यादा ज़ोर से बजता। कभी-कभी इतनी ज़ोर से कि आवाज़ धरती तक जाती और दुनियावाले ज़लज़ले की आशंका से डर जाते। चुप एक रेशा था जिसे बुन-बुनकर पुरुष ने मोटी रस्‍सी जैसा बना दिया था। एक दिन शोर से तंग आकर उसने रस्‍सी का एक सिरा स्‍त्री के हाथ में थमाया और दूसरा खु़द पकड़कर दूर होता चला गया। वो चुप रहना चाहता था, उन आवाज़ों से दूर होना चाहता था जो उसे उनके राख हो चुके घर की याद दिलातीं। अनसुना करना चाहता था उस सारी गूंज को जो उनके बोलते, मुस्‍कुराते, चहकते सपनों की थी। चुप कर देना चाहता था हर उस पुकार को जो इधर से उधर दौड़ते हुए उन्‍हें हर तरफ़ से जल्‍दी घर तैयार करने की याद दिलाती। चुप उसकी शरणस्‍थली थी। 
 चुप की रस्‍सी लोहे से ज्‍़यादा सख्त़ और कांटों से ज्‍़यादा कटीली थी। स्‍त्री उसपर जब-जब अपने महीन, मुलायम और और रुई से हल्‍के बोल सजाना चाहती, वे रस्‍सी को छूते ही जख्‍़मी हो जाते और गिर पड़ते। फिर वो हज़ार शोर करती और बदसूरत, कठोर, मोटे शब्‍द खोज-खोजकर चढ़ा देती चुप की उसी रस्‍सी पर। शब्‍द इतनी रफ़तार से दूसरे सिरे तक जाते कि वो हैरान देखती रह जाती। हर बार सोचती कि मेरे मीठे बोल   क्‍यों नहीं चढ़ पाते इस तरह.....। उसके प्‍यारे शब्‍द फूट-फूट कर रो उठते और उन्‍हें रोता देख सारे कठोर शब्‍द क़हक़हे लगाते। क्‍यों जीत रहे थे वे शब्‍द......?
रस्‍सी हर दिन तनती जा रही थी। इसे जिस दिन पहली बार पुरुष ने अपने हाथ में लिया था, उसी दिन उसे वो हाथ छुड़ाना पड़ा था, जिसे वो सोते समय भी नहीं छोड़ता था। पहला अपशकुन यही था। स्‍त्री चाहती थी कि पुरुष इस चुप का साथ छोड़ दे, उसका हाथ फिर से थाम ले और आकर उससे बात करे अपने घर की, उन सारे हरे पौधों की जो उनके आंगन में लगने वाले थे...उन तस्‍वीरों की जिनके रंग घुले रह गए थे दीवारों पर सजने से पहले ही। वो उसके साथ दोहराए वो सारे गीत, जो वे हज़ारों बरस से गाते आ रहे थे। लेकिन वो चुप ही रहता। अपने में गुम और इतना बेपरवाह की कई-कई दिन उसे याद भी न रहता कि इस तनी हुई रस्‍सी को थामे-थामे स्त्री के कोमल हाथ जख्‍़मी हो चुके हैं। वो उसकी तरफ़ ही नहीं उस दिशा में भी देखना भूलने लगा था जिसमें स्‍त्री देखती थी। इससे पहले वे हमेशा एक ही दिशा में एक ही चीज़ को एक ही नज़र से देर तक देखा करते थे। अब वे अपनी-अपनी नज़र से वही देखते जो देखना चाहते थे। एक चुप इतनी भारी थी  कि उसने उन दोनों के सारे बोलते सपनों की ज़बान पर पत्‍थर रख दिया था। वे गूंगे सपने लिए चुप खड़े थे रात-दिन......न जाने किस इंतजार में।  उन्‍हें लगता जैसे वे चुप्‍पी के एक डरावने सपने में बंदी हैं। वे इसमें घुस तो गए, लेकिन बाहर निकलने का रास्‍ता उन्‍हें सूझता नहीं......। 
क्‍या है,  इस डरावने सपने को तोड़कर बाहर निकल आने की कोई राह... ?

नोट- यह पोस्‍ट रविवार को पोस्‍ट होने के  कुछ देर किन्‍हीं कारणों से दिख नहीं सकी। पुन: पोस्‍ट कर रही हूं, असुविधा के लिए क्षमा करें। ख़ास तौर पर पारुल और डॉ. बेजी से माफ़ी, क्‍योंकि उनके  भेजे गए कमेंट भी यहां  दिख नहीं पा रहे हैं। 

Wednesday, 30 July, 2008

क़हक़हे का अर्थ रुदन भी होता है

एक दिन पुरुष ने क़हक़हा लगाया।

कहते हैं कि संप्रेषणीयता का नियम होता है कि जो जैसे कहा जाए, वैसे ही सुना जाए और समझा भी जाए। इस मामले में पुरुष की संप्रेषणीयता कमज़ोर थी। वह अपना क़हक़हा ख़ुद नहीं समझ पाता था। उसे लगता था कि उसने क़हक़हा लगाया है, लेकिन ख़ुद उसे वह किसी दारुण रुदन की तरह सुनाई देता था।

जब पहली बार स्‍त्री ने उसका क़हक़हा सुना, तो वह चौंक गई। उसने पूछना चाहा कि तुम किस बात पर यूं हंस रहे हो, पर यहीं पर पता चला कि स्‍त्री भी संप्रेषणीय नहीं रह पाई थी। वह मुंह खोलती थी और ध्‍वनि अपनी श्रव्‍यता खो देती थी। उसकी ज़ुबान पर एक जोड़ी कान रहते थे, वे ख़ुद उसका पूछना सुन लेते थे लेकिन पुरुष उसे सवाल की तरह नहीं सुन पाया था। उसने सवाल को एक फूंक की तरह सुना और अपने क़हक़हे के अर्थों में इस तरह खो गया, जैसे किसी ज़माने में एक राजा, एक ऋषिकन्‍या को दी गई अंगूठी के खोने में रहता था।

इस तरह देखा जाए, तो जैसे अंगूठी खो गई थी और अंगूठी के खोने से दो लोगों के बीच का प्रेम पतेदार रहते हुए भी लापता हो गया था, उसी तरह क़हक़हे लगाता एक पुरुष, क़हक़हे का अर्थ खो जाने से ख़ुद भी खो गया था।

उन दिनों हवा सचमुच बेहद मेहरबान थी और ईमानदारी से कहे गए शब्‍दों को ठीक उनके मूल स्‍वरूप में ही यहां से वहां बहाकर ले जाती थी। उन दिनों बारिश भी बहुत ईमानदार थी और आसमान से दूब तक के अपने सफ़र के दरमियान आए शब्‍दों को कभी इस तरह नहीं घिसती थी कि वे घिसे हुए शब्‍दों की अभिशप्‍त पहचान के साथ जीवित रहें।

तो बहती हुई हवा पुरुष के उस क़हक़हे को बहाकर ले गई और बहुत सारे दूसरे अदृश्‍य लोग, जो उनके हवाघर के आसपास ही रहते थे, वे हवा से बने हुए दरवाज़ों पर दस्‍तक देने लगे। उस स्‍त्री ने हवा से बनी कुंडी हटाकर हवा से बना दरवाज़ा खोला, तो उन अदृश्‍य लोगों ने उससे पूछा कि पुरुष इतने ज़ोर-ज़ोर से क्‍यों भला रो रहा है?

उसने कहा कि नहीं, पुरुष तो क़हक़हे लगा रहा है, लेकिन उसकी यह बात भी संप्रेषणीय नहीं रही। अदृश्‍य लोगों ने अपने अदृश्‍य कानों से उसे भी फूंक की आवाज़ की तरह सुना और वे डर गए कि स्‍त्री फूंक कर टोना कर देती है। वे रोष में आ गए और स्‍त्री के बाल पकड़कर उसे टोनहिन कहते हुए पीटना चाहते थे।

पुरुष अपने क़हक़हों में मुब्तिला था और दरवाज़े पर खड़ी स्‍त्री अदृश्‍य इरादों से कांप रही थी। इतने में किसी अदृश्‍य हाथ ने कमर के नीचे तक लहराने वाले बालों को पकड़ उसे घसीटा। उसने डरकर जो चीख़ मारी, वह भी एक फूंक में बदल गई। उस स्‍त्री की हर आवाज़ फूंक में बदल जाती। वह संप्रेषणीयता के नियम की तानाशाही थी। वांछित था कि हर शब्‍द को उसी के अर्थों में समझा जाए। न थोड़ा दाएं, न थोड़ा बाएं। संप्रेषणीयता के नियम की बही में स्‍त्री के आगे अंग्रेज़ी में एफ़ लिखा गया था, जिसका फुल फॉर्म फ़ीमेल नहीं, फ़ेल संप्रेषित होना चाहिए।

स्‍त्री द्वार पर आंत दाब कर रोती रही और उसके रोने की आवाज़ फूंक की आवाज़ सी सुनाई दे रही थी।

अचानक उसे पुकारता हुआ पुरुष द्वार पर आया। वह अंगूठी के खोने पर फि़क्र जता रहा था और उसके खोने में उन दोनों के खोने को रोक देना चाहता था।

क़हक़हे की आवाज़ अब रुदन की आवाज़ के रूप में संप्रेषित हो रही थी।

Friday, 25 July, 2008

छत नहीं थी, छत की ख़ाली जगह बची थी


- तुम्हारी भाषा में गाल को क्या कहते हैं?
- गाल को? हम्म्म्... होंठ कहते हैं।
- तो फिर आंख को नाक कहते होंगे?
- नहीं जी, आंख को तो घर कहते हैं।
- अच्छा?
- हां जी। आंख में रहा जाता है। सपना बनकर, आंसू बनकर, बादल बनकर... और किरकिरी बनकर।
- और घर का दरवाज़ा? जो कभी वह बंद हो गया तो?
- जो बाहर से बंद हो गया, तो समझो, भीतर वाले कहीं और रहने चले गए।
- और भीतर से बंद हो गया तो?
- तो समझो, भीतर वालों को अब कहीं नहीं जाना, कभी भी। बंद दरवाज़े के भीतर वे हमेशा साथ-साथ रहने वाले हैं।
- आंख के भीतर दीवार रहती है?
- दीवार में एक खिड़की भी रहती है।
- खिड़की से कौन झांकता है?
- वह हवा, जो दीवार के उस पार रहती है।
- वह हवा वहां से हट गई तो?
- उस हवा की ख़ाली जगह वहां से कभी न हटेगी।
- ख़ाली जगह इंतज़ार करती रहेगी।
- इंतज़ार क्या है? एक बारिश ही तो है।
- और बारिश ईमानदार न हुई तो?
- तो वह एक पेड़ बन जाएगी, जिस पर कभी सचमुच की बारिश न हुई हो। जो एक बड़ा छत जैसा सिर लिए निपट अंधेरे में ख़ुद पर शाप की तरह बरसती गरमी झेलेगा।
- हवा से उसका काम न चलेगा?
- हवा तो कब की हट चुकी होगी।
- तो उसका क्या होगा, जिसका घर हवा में है?
- वे बेदरो-दीवार सा एक घर बनाएंगे, जहां कोई हमसाया न होगा, पासबां भी नहीं होगा।
- हवा तो उसमें भी चाहिए होगी?
- हम्म... मैं एक फूंक मारूंगा, जिससे तेरे कानों के बूंदें हिलेंगे और उस हवा से और हवा बन जाएगी।

स्त्री ने अपने कान को उंगली से स्पर्श किया। जैसे ट्रॉय की हेलेन ने छुआ था। जैसे एक पुच्छल तारे ने चांद को छुआ था और दुखी होकर अपने बदन से रोशनी छीलकर फेंक दी थी। जैसे लाजवंती घास ने बग़ल से गुज़रती चुन्नी को छुआ था और हमेशा के लिए अपनी सकुचाहट में खो गई थी।
स्त्री ने जाने कब से बूंदे नहीं पहने थे।
और उसके बाद वह चुप हो गया। स्त्री चीज़ों को जोड़कर रखना चाहती थी, पुरुष किसी नए इतिहास के लेखन के लिए बार-बार क़लम की निब घिस रहा था।
स्त्री ने पूछा- हमारे घर की छत कहां गई?
- किसी थके हुए फेफड़े को दान कर दी। वह सांस ले-लेकर थक चुके थे। छत की हवा किसी को जीवन दे रही है।
स्त्री सीढ़ी चढ़ते हुए हांफ रही थी और छत के बाद बची हुई, छत की ख़ाली जगह को देख रही थी।

Wednesday, 18 June, 2008

श्‍वास, विश्‍वास और महीने का एक दिन

ऐसा हमेशा से होता आ रहा था। महीने में एक ख़ास दिन, ख़ास वक़्त पर वे अपने सारे दुख-दर्द भूल जाते, इस दिन सूरज-चांद अपने पांव मोड़कर सुस्ताने बैठ जाते और सातवें आसमान से ज़रा ऊपर, बेघर भटक रहे वे दोनों नीम अंधेरा देखकर ज़मीन की ज़द तक आ जाया करते थे। सबसे चमकीला तारा उठाकर पुरुष, स्त्री के माथे पर टांक दिया करता और सबसे गाढ़े बादल का सुरमा उसकी आंख में खुद लगा देता था। इस दिन का इंतजार वे पूरे महीने करते थे। पुरुष के बाएं कंधे पर घंटों सिर टिकाए बैठी रहती स्त्री को देर तक अपनी मांग में गीलापन महसूस होता जो पुरुष की आंखों से रिसकर वहां तक पहुंचता था। इन पलों में प्रवेश करने से पहले वे सारे दुख और पीड़ा को आसमान की सबसे ऊंची अलगनी पर टांग देते थे और गाली कभी इस वक्त उनके बीच आने का दुस्साहस न कर पाती।

इसी रात ज़मीन पर भी उत्सव मनाया जाता। किसी को पता नहीं था कि इसकी शुरुआत कैसे और कब हुई लेकिन किंवतंदियों से पता चला था कि जब सूरज और चांद थककर सांस लेने बैठें और आकाश का सबसे चमकीला तारा अपनी जगह पर न दिखे तो, देर रात तक घरों से बाहर निकलकर लोगों को नाचते-गाते प्रार्थना-गीत गाने चाहिए। धरती के हरी-भरी और प्रेम से परिपूर्ण रहने की दुआ इस रात कुबूल की जाती है, ऐसा कहा करते थे बुजुर्ग। दुनिया को ज़रूरत थी प्रेम के एक प्रतीक की, जो इन दुआओं के जरिए ही धरती तक उतरने वाला था। नाचते-गाते लोगों की दुआ जब भी उनके पास से होकर गुज़रती, उनके हाथों की पकड़ और कड़ी हो जाया करती। इस पकड़ पर बहुत विश्वास था उन्हें। वे एक दूसरे से पूछते-कहां रहता है विश्वास.... और फिर साथ-साथ दोहराते-हाथ की इस पकड़ में, हथेली के तिल में, आंख की गीली कोरों में और......... और आत्मा में छिपी उस आधी बूंद में। पर, बूंद तो दिखती नहीं, आत्मा तो बेशक्ल है, पहचानेंगे कैसे, एक के शुबहे को दूजा हमेशा ये कहकर शांत किया करता-आंख की गीली कोर तो दिखती है न....हथेली का तिल भी, कैसे भूल जाएंगे फिर........। इससे ज्यादा सवाल-जवाब की गुंजाइश उनके बीच कभी बनी ही नहीं।

उनका विश्वास अटल था लेकिन इधर गाली ने अपना कुनबा बढ़ा लिया था। उसे अब अपने रहने के लिए ज्यादा जगह चाहिए थी। इतनी- कि कभी-कभी उन दोनों के खुले हाथ भी एक दूसरे को छू न पाएं। उसका सबसे क़रीबी नातेदार झूठ था। जैसे गाली ने पुरुष को छला था, झूठ ने स्त्री को बहका लिया था। वे जब भी इनके कहे में आते, हाथों की पकड़ ढीली पड़ जाती और वे दूर होने लगते। पहली बार जब ऐसा हुआ तो वे बेहद डर गए थे। लेकिन इसके बाद जब भी ऐसा होता वे समझ जाते कि कुछ देर दूर रहने का वक़्त आ गया है। वे दोनों साथ रहते लेकिन इस बारे में कभी कुछ न कहते। यहां तक कि उस दूरी के बारे में भी बात न कर पाते जो उनके बीच हर दिन बढ़ रही थी। वे हमेशा एक-दूसरे से कहते कि वे एक-दूसरे के लिए ही बने हैं और इस विश्‍वास को सांस की तरह सीने में उतार देते. जिन पलों में सांस रुकी हुई होती, हवा का कोई अता-पता न होता, उन पलों में यही विश्‍वास नासिका में यात्रा करता, उन्‍हें हवा का पता बताते हुए. उस हवा का, जहां उन्‍होंने एक घर बनाया था.

Sunday, 1 June, 2008

दो की तरह बनाना और तीन की तरह बिखर जाना...

...ईश्वर ने नूर की एक बूंद को आधा-आधा रोपा था उनकी रूह में। इस बूंद के आधेपन की ख़ातिर वे पूरे के पूरे एक-दूसरे में रहने लगे थे। धीरे-धीरे उन्हें पता चला कि वे बने ही एक दूसरे के लिए हैं। बूंद बहुत चमकदार थी, अपनी उजास से उन दोनों के वजूद रोशन रखती। वे अगर कहीं अलग हो जाते तो ये उजास दूर से ही बता देती थी उनके जाने की दिशा। वे ज़्यादा देर, ज़्यादा दूर रह नहीं पाते थे। नूर की बूंद इतनी दुबली थी कि दो फांकों में रहे, तो अंधेरा उसे निगल जाए। और इतनी मज़बूत थी कि कई अंधेरी रातों को मशालों के मुंह में झोंक दे।

लेकिन ये बात उनके बेघर होने से पहले की है। तब हवाघर था और वे दोनों भी थे एक दूसरे में सुख से रहते हुए। ज़मीन से उठी चिंगारियों ने जब से उनका घर जलाया, तब से वे दोनों एक दूसरे में नहीं, एक दूसरे के साथ रहने लगे थे। चिंगारियों के साथ ही एक गाली उछलकर उनके बीच आई थी। एक ने गाली दी थी तो दूसरे ने ले ली थी। मना कर सकने की सारी संभावनाओं के बावजूद लेकर रख लिया था उसे। वो गाली अब वापस जाने का नाम नहीं लेती थी, उनके साथ रहने लगी थी पूरे वज़न और मायनों सहित। उसने उन दोनों के बीच एक जगह बना ली थी अपने रहने के लिए।

जला हुआ घर हवा में तैरता था इस उम्मीद से, कि आज नहीं तो कल उसके काले हो गए फ़र्श को बादल भर बारिश से धो दिया जाएगा, अधजली छत को चांदनी से एकसार कर पाट दिया जाएगा, हवा की खिड़कियां उनकी तरफ़ देखतीं और सोचती कि किस दिन वे दोनों आकर वहां एक गहरी सांस लेंगे और अपनी उसांस से वहां जमी राख को उड़ा देंगे । फिर यहां से झांककर पूरी रात ज़मीन की तरफ़ देखते हुए कुछ बहुत पुराने गीत गाएंगे और सनातन उदासियां वैसे ही उड़ जाएंगी, जैसे भाप बनकर पानी। आसमान के सीने पर होंठ की फांक के निशान की तरह चस्‍पा इंद्रधनुष अक्सर उनसे पूछना चाहता- इस सिरे से उस सिरे तक तैरकर झूलना नहीं है क्या...? वो अपने रंगों को और चटख़ कर लेता कि इस बहाने ही सही वे इधर देखेंगे तो...। लेकिन वे किसी की तरफ़ नहीं देखते थे। क्या हो गया था उन्हें?

सबकी उम्मीद उनपर थी लेकिन वे एक दूसरे से नाउम्मीद हो चुके थे। वे जब भी एक दूसरे की तरफ़ देखने की कोशिश करते, गीली आंखों में गाली आकर बैठ जाती और फिर कुछ कहने की गुंजाइश ही न बचती। वे जब भी एक दूसरे में रहने की कोशिश करते, गाली साथ हो लेती और वे वापस हो जाते। वे दो की तरह उस घर को बनाने के लिए बार-बार दरो-दीवार चुनते और तीन की तरह बिखेर देते। घर किसी तरह बनने में नहीं आ रहा था। उनकी हथेलियों में हज़ार छेद हो गए थे, इसीलिए उनमें कुछ टिकता ही नहीं था।
वे एक दूसरे के साथ नहीं, एक दूसरे में रहना चाहते थे, पहले की तरह। लेकिन वे अब दो इंसानों से ज़्यादा एक स्त्री और एक पुरुष थे। पुरुष उसे हमेशा अपनी बाईं तरफ़ रखता था। हाथ में हाथ डाले वे चुपचाप हवा में तैरते थे, हाथ की पकड़ ऐसी थी कि एक की हथेली के तिल का निशान दूसरे की हथेली में उग आया था। वे अपने घर को बहुत याद करते, और जब भी रोते, तो नमकीन-सी बरसात होती। होती ही रहती। ज़मीन पर रहने वाली दुनिया और साइंसदां किस्‍म के लोग उस बरसात के पानी को पोखरों-तालाबों में जमा करने की जुगतें भिड़ाते, मासूम-से बच्‍चे उस बरसात में पानी-पानी खेलते, सयाने उसके पानी से अपने काम की कोई न कोई फ़सल उगाने लग जाते। कोई बारिश की उस गंगोत्री की तरफ़ झांक कर नहीं देखना चाहता था, जो दो जोड़ी आंखों से बही आ रही है। उल्‍टे, सब किसी न किसी देवता के हाथ जोड़कर कहते कि ये बारिश ऐसे ही होती रहे।

वे दोनों चाहते हैं कि बारिश रुक जाए, पर क्‍या इस बारिश का रुकना दुनिया की दुआ के खि़लाफ़ चला जाएगा?

Sunday, 11 May, 2008

एक घर, जो हवा में तैरता है

जब वो घर था, तब दुनिया में कुछ नहीं था। न सड़कें थीं, न कारख़ाने, न चौराहे थे, न लोग। दुनिया में कोई हिमालय नहीं था, कोई समंदर भी नहीं. कोई आग नहीं थी, कोई पानी नहीं. तब कोई भाषा भी नहीं थी. सिर्फ़ दो लोग थे। उन दोनों ने रहने के लिए एक घर बनाया था, जिसकी दीवार हवा की थी। छत हवा की थी। फ़र्श भी हवा की। हवा की दीवार में से थोड़ी-सी हवा निकाल कर उन दोनों ने हवा की एक खिड़की बना दी थी। इसी तरह हवा का एक दरवाज़ा। उन दोनों के पास कोई भाषा भी नहीं थी। गूं-गूं करती कोई आवाज़ थी। वह आवाज़ भी एक घर ही थी, जिसमें वे दोनों वैसे ही रहते थे, जैसे बेदरो-दीवार के उस हवाघर में. वहां कभी घुटन नहीं होती थी. हर वक़्त हवा आती थी. जाती भी थी.

एक दिन भाषा बन गई। भाषा में सबसे पहले प्रार्थना ईजाद नहीं हुई थी। यह हमारी ग़लतफ़हमी है। भाषा में सबसे पहले नफ़रत और गाली ईजाद हुई। किसी विचारक ने कहा था कि भाषा में सबसे पहले प्रेम के लिए शब्‍द खोजा गया था. ग़लत था वह विचारक. प्रेम को भाषा की ज़रूरत थी ही नहीं.

तो भाषा में सबसे पहले गाली आई, जो साफ़ तौर पर एक स्‍त्री को दी गई थी। फिर दुनिया फलने-फूलने लगी। फिर समंदर बना। फिर हिमालय. फिर दर्रे. घाटियां. झाडियां और फूल. कांटे भी साथ-साथ ही बने. सड़कें बनीं. इमारतें भी. उनसे पहले थोड़ी सी आग भी बन गई थी. वह दो पत्‍थरों के बीच रहती थी और तभी दिखती थी, जब पत्‍थर आपस में लड़ पड़ें. फिर बहुत सारे लोग भी बन गए। वे पत्‍थरों की तरह कई बार लड़ पड़ते थे और आग पैदा करते थे।

वे दोनों चुप अपने हवाघर में रहते थे। किसी समय लोग आपस में पत्‍थरों की लड़ पड़े, जिससे आग पैदा हो गई। चिंगारियां उस हवाघर पर पड़ीं और वह जलने लगा। हवा की दीवार, हवा की खिड़की, हवा की छत, हवा की फ़र्श, सब जलने लगे। हवा का वह घर जल गया। हवा में ही बचा हुआ है अब। वे दोनों उसमें रहते थे, अब बेघर होकर भटकते हैं। न वह घर किसी को दिखता है, न उसमें रहने वाले वे दोनों। कहते हैं, हवा हो जाने का मतलब कभी दिखाई न पड़ना है।

पर मुझे अब भी अपने आसपास ही दिखता है हवा का वह घर। हवा जैसे वो दोनों रहने वाले। आंखों पर पानी का परदा चढ़ाकर देखें, तो शायद आपको भी दिख जाएंगे वे दोनों. और हवा में तैरता उनका एक घर. दिख रहे हैं न?