Tuesday, 21 October, 2008

क्‍या कहकर पुकारूं?


मौसम कहीं चले गए थे। बहुत दिन से उनकी कोई ख़बर नहीं। बिना बताए ही निकल गए। एक बार पलटकर कहा भी नहीं कि रोक लो हमें, बाद में ढूंढ़ न पाओगे। अब क्या कहकर उन्हें लौट आने के लिए आवाज़ लगाई जाए... दोनों को ही नहीं पता। कभी पूछे ही नहीं थे मौसमों के नाम। कोई अगर कह दे मौसम... मतलब क्या...? तो जवाब में उनके पास बताने के लिए बस इतना ही था कि वे हल्के कुनकुने से ख़रगोशी मुलामियत वाले दिनों की बात कर रहे हैं ...या उन रातों को ढूंढ़ रहे हैं जिसकी पीठ पर गाढ़े और ठंडे कोहरे की लामबंदी एक गट्ठर की शक्ल में नज़र आती थी.. या फिर वो दुपहरियां जिनमें हर तरफ छांव का छलावा डोलता फिरता। या कुछ ऐसे दिन भी, जिनमें गीले मन पर सतरंगी धनुष खिंचे नज़र आते थे। पहचान के लिए एक से ज़्यादा निशानियां थीं, लेकिन इस सबसे मौसम लौटने वाले नहीं थे। उन्हें वही पुकार चाहिए थी, जिसमें उनका नाम गूंजे।

पुरुष का तर्क था- नाम पूछना औपचारिकता है.. और हर औपचारिकता झूठ पर टिकी होती है। स्त्री ने उसकी बात पर कभी सवाल उठाया ही नहीं, तो भला मौसमों के नाम कौन पूछता और पूछकर करता भी क्या। वह कहता- बात सिर्फ़ अहसास की है, जिसे नाम नहीं दिया जा सकता, जब नाम दिया ही नहीं जा सकता, तो रखा कैसे जा सकता है, और रख भी लिया, तो क्या वह उस अहसास का पूरा और सही अनुवाद सामने रख पाता है... अक्सर स्त्री इन बातों को न समझते हुए भी हां में सिर हिला दिया करती थी। एक लकीर पर चलना उसकी नियति थी... उससे ज़रा भी हटते ही अंदर से एक आवाज़ आती- कहां भटक गई.... पता है न तेरा रास्ता सीधा है....। अब इस रास्ते जैसे ही सीधे-सपाट दिन सामने नज़र आते थे। सारे अहसास मौसमों के साथ गुमशुदगी में थे और इसकी जि़म्मेदारी किस पर आयद हो.... पता नहीं था।

पुरुष मौसमों की चिंता में गुम था और स्त्री के सिर एक और दुख आन पड़ा था। वह दिन रात घुल रही थी इस सोच में कि उन्हें तो एक-दूसरे का नाम भी नहीं पता.... अगर किसी दिन मौसम की तरह पुरुष उठकर चल दिया, तो क्या कहकर आवाज़ देगी उसे... जिन निशानियों की बात पुरुष किया करता है, वे तो पास आने पर ही दिखती हैं न... दूर से बुलाना हो तो क्या कहेगी वह...। और अगर दुर्भाग्य से स्त्री ही किसी दिन राह भटक गई, तो कैसे पुरुष आवाज़ देगा उसे....। वह तो यूं भी रात-दिन अपना घर बनाने के लिए अक्सर अकेले भटकती फिरती है। कितना अजीब था, एक उम्र बिना नाम के गुज़ार लेने के बाद अचानक नाम की ज़रूरत पड़ जाना...। नाम होने की औपचारिकता का न निभाया जाना, असुरक्षा के कुंए के बहुत पास जाकर रोकता था उसे... डूब जाने के बेहद क़रीब। वो डूबना नहीं चाहती थी... अकेले तो बिल्कुल ही नहीं।

अब उसे एक शुभ मुहुर्त ढूंढना था, जिसमें वे एक दूसरे के नाम रख सकें.....।

Wednesday, 15 October, 2008

चांद को पिघलाकर कान का फूल बनाना


अपने अंदर बने मौन के कुएं में वे एक शब्द छप्प से फेंकते और देर तक उससे बने वलय देखते रहते। जांचना जैसे ज़रूरी हो गया था कि शब्दों का सही अर्थ प्रतिध्वनित हो रहा है या नहीं। मानो एक गोपनीय प्रयोगशाला में परख लेने के बाद ही वे अब शब्दों को बाहर लाना चाहते हों। कितना अजीब था एक दूसरे की नज़र से बचने के लिए नहीं बल्कि ठीक से देख सकने के लिए आंख बंद कर लिया जाना। इन्हीं दिनों तो एक बार फिर आविष्कार किया था उन्होंने उस नूर की उस बूंद का जिसे ईश्वर ने उनकी आत्मा में आधा-आधा रोपा था। यही एक बात उन्हें बहुत सुख देती।

इसी सुख के बीच ऐन सिर पर आकर टंग गई पूरनमासी ने धीरे से आकर स्त्री के कान में रहस्य खोला- आज की रात सब कुछ मेरी चांदनी से धो लेना... सारा कलुष दूर हो जाएगा....। इतना उजलापन होगा जीवन में कि कभी किसी अंधेरे का साहस नहीं होगा पास फटकने का। यह अंधविश्वास था लेकिन स्त्री को इसे मान लेने में कोई उज्र न हुआ। उसने एक-एक करके वे सारे शब्द चांदनी में धो डाले जो उनके बीच सांझे थे और मैले होकर बहुत चुभते थे। उन सारी कामनाओं को एक बार फिर बाहर निकालकर चांदनी दिखा दी जो मन के कोनों में पड़े-पड़े अपना रंग-रूप खो रही थीं। उसे लगा इस बार पूरनमासी एक रात के लिए नहीं बल्कि पूरे जीवन के लिए आई है, प्रेम के चक्र को पूरा करती रिश्तों की पूरनमासी। ब्रह़मकमल इस बार खुलकर खिलखिलाए थे।

स्त्री सबकुछ उजला कर लेना चाहती थी तो पुरुष का कारीगर दिमाग़ इस चांदनी से एक ऐसा गहना गढ़ना चाह रहा था जो वो स्त्री को दे सके निशानी के तौर पर। उसने कहा- मैं एक पाज़ेब बनाता हूं....फिर कहा नहीं कंगन बनाना चाहिए....फिर सोचने लगा चोटी में गूंथ सकने लायक फूल ही क्यों न बना दूं....। उसका चित्त थिरता नही था और स्त्री ने सब पढ़ लिया था उसकी आंखों में। कहने लगी- तुम एक अंगूठी क्यों नहीं बनाते, मेरी अनामिका के लिए....? पुरुष को बात जंच गई लेकिन बनाते-बनाते उसका चंचल मन फिर बदला और वो बनाने बैठ गया ऐसे कर्णफूल जो चांदनी की सबसे उजली किरण को पिघलाकर गढे़ जाने थे।

स्त्री अपनी उंगलियां देखते हुए एक अंगूठी की कल्पना कर रही थी कि दमकते हुए कर्णफूल उसके कानों की लौ को छूने लगे...। हंसते हुए स्त्री ने पूछा- तुम याद रख सकोगे कर्णफूल और मुझे... पुरुष ने कहा- मैंने ही तो बनाए हैं, क्यों याद नहीं रखूंगा। अंगूठी तो इसलिए नहीं बनाई कि कहीं पानी पीते हुए वो उंगली से फिसलकर किसी मछली के पेट तक न पहुंच जाए...। कहते हुए उसकी आवाज़ इतनी पारदर्शी हो गई थी कि उसमें शामिल सारे सच्चे रंग दिप-दिप कर उठे थे.... इसी समय चांद को पहली बार लगा कि उससे ज्यादा चमकदार है यह प्रेम और हर पवित्रता से ज्यादा पवित्र है इसका रंग। पुरुष झूठ नहीं बोला था। उसे विश्वास था कि वो अपने किए प्रेम की तरह अपने गढ़े गहने को भी हमेशा, हर हाल में पहचान सकेगा....

Monday, 6 October, 2008

बहुत, मतलब बहुत...

चुप को चुपके से तोड़ देने की बात पहले किसके मन में आई....इसे लिखकर रखने की ज़रूरत नहीं थी। इतना समझ लेना काफ़ी था कि वे अपने बीच बीत चुके सदियों के मौन का कोई निशान बाक़ी नहीं रखना चाहते। सचमुच रस्सी का अस्तित्व महज़ उसे पकड़े रहने में ही तो था, सिरा हाथ से छूटा और उसके बाद पता ही न चला कि कहां गई वो अनिष्टकारी चुप। अब वहां आवाज़ थी शब्द-दर-शब्द...गूंज-दर-गूंज। आदिम बोल सच था और वो चुप टूट जाने वाला झूठ। उसकी अगवानी नहीं की गई थी तो विदा करने की जरू़रत भी नहीं पड़ी। पराजित कौन हुआ था....इस बहस से दूर स्त्री और पुरुष की चिंता अब उन अफ़वाहों पर थी जो पंख लगाए घूमतीं और कहतीं पतेदार प्रेम लापता हो गया....या फिर वे एक दूसरे के लिए बने होने के सच को भूल चुके हैं....।

पुरुष उसे समझाता- कुछ नहीं है ये सब.... सच सिर्फ़ हमारा एक दूसरे के पास होना है... सच सिर्फ वो तिल है जो इतनी दूर जाने पर भी अपनी जगह कायम रहा...सच आंख का वो गीलापन है जो सूख नहीं सका........सच सिर्फ़ वो आवाज़ है जिसे सुनकर मैं चुप नही रह सका...।
स्त्री उसकी बात मान लेती और सोचने लगती- अफ़वाहें भी चार दिन की हैं जैसे चुप की उम्र थोड़ी थी... राहत की एक नरम सांस उसे छूती और वह आंख बंद करके इस बात पर विश्वास करने लगती कि आज इस पल जो है वही सच है।

इस बात पर शुक्र मनाया जा सकता था कि आंख में बचे घर वाला दरवाजा़ न अंदर से बंद किया जा सका और न ही बाहर से उसपर ताला डाला गया... वहां रहने वाले वे दोनों अपनी शक्ल साफ़-साफ़ देखते हुए इस बात की तसल्ली कर सकते थे कि वहां कोई और कभी था ही नहीं। पुरुष टकटकी लगाकर उस माथे की तरफ़ देखते हुए एक बार फिर कहता चाहता था... यही है सृष्टि का सबसे सुंदर माथा....। यहीं वो सूर्य के डूब जाने और फिर से उग आने का रहस्य खोजता रहा है... लेकिन इससे पहले ही उधर से सवाल आ जाता- बताओ तो कितना सुंदर.... पुरुष के पास हमेशा से वो जवाब साबुत था सो झट से कहा- बहुत सुंदर... सवाल और मुखर होता....बहुत ? तब वो कहता- बहुत मतलब बहुत, फिर से मत पूछना। एक संगीत झन से बजता....शायद आत्मा का ही, ये शब्दों का अपव्यय नहीं था, बल्कि पूरा और कारगर इस्तेमाल कहा गया इसे।

युगों के बाद उस रात वे एक बार फिर अपने आंगन में हरा पौधा लगाने की बात करते-करते सो गए थे....। दूर गए क़दम लौटे थे या फिर सौभाग्य का वह सनातन चिन्ह जो उस माथे पर दोबारा उसी रात नज़र आया था....।