Wednesday, 17 September, 2008

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा

टूटी पलक को यूं ही ज़मीन पर गिरने नहीं दिया जाता... रोक लिया जाता है गाल पर ही। उल्टी हथेली पर रख, आंख बंद करके एक दुआ मांगी जाती है और कभी किसी को बताया नहीं जाता कि मांगा क्या गया। लेकिन वे तो अपनी सारी दुआएं मिलकर ही मांगा करते थे, इसलिए एक दूसरे को न कह सकने की बात बीच में आ ही नहीं सकती थी। दुआ का विधान अपनी जगह क़ायम था और क़ुदरत ने इस बात को चाहते-न चाहते मान ही लिया था कि उन दोनो से कभी कोई एक दुआ दो हिस्सों में बंटकर उस तक नहीं आने वाली। इसीलिए उसकी बही में उनके नाम के आगे लिख दिया गया था- 'उनमें से जब भी कोई अकेले दुआ मांगेगा, तो वह आसमान और ज़मीन के बीच लटकी रह जाएगी। न पूरी होगी और न ही उसके पूरे न होने की ख़बर वापस उन तक भेजी जाएगी।' लेकिन इस बात को भूले बिना ही उन्होंने अलग-अलग दुआ मांगना शुरू कर दिया। दरअसल दुआएं भी बदल गई थीं। स्त्री चुप के टूट जाने की दुआ मांगती और पुरुष उस चुप को सहन कर सकने की शक्ति मांगता, सब्र मांगता.... जबकि दुआएं थीं कि उनके भूल जाने को सज़ा देती हुई ज़मीन और आसमान के बीच किसी बादल के सफ़ेद केशों में बरसों पुराने किसी गुलाब की तरह अटकी रहती.

अधर में वह चुप भी थी, जो उनके होठों के भीतर सिसक की गूंज बनकर रहती थी। कोहराम और चीख़-पुकार अब बाहर नहीं, अंदर ही घुटते थे। जिससे कभी-कभी ख़ुद उनके ही कान फटने लगते। उन्होंने अपने अंदर एकांत बो लिया था, ऐसा एकांत जो रात-दिन फैलता और उन्हें अकेला करता जाता। उतना ही अकेला जितना वह चांद था जो चुपचाप उनकी चुप्पी को देख रहा था। बिना आवाज़ के वो उन दोनों को समझा देना चाहता था कि अकेलेपन के पौधे को खाद-पानी मत दो, क्योंकि एक बार वह ख़ुद ऐसा करके आज तक अकेले रहने को अभिशप्त है। अकेलेपन को उससे ज़्यादा कोई नहीं जानता था। वे दोनों चांद की बात समझ रहे थे, लेकिन शायद वे भी अभिशप्त थे उस चुप और अकेलेपन को जीने के लिए, जिसमें हरपल गुज़र रहा था उनका।

उनके बीच की दूरी कितनी थी... जनम भर दौड़ते रहो तो भी पार न पा सको, और एक हल्की सी सरग़ोशी को जिंदा कर दो, तो एक झटके में ख़त्म हो जाए...। जितनी क़ुरबत... उतना ही फ़ासला। वे एक दूसरे की तरफ़ देखना भी चाहते, तो वहां कुछ न दिखता... सिवाय एक बिंदी के...। बिंदी अक्सर काली होती, कभी-कभार नारंगी और हरी भी। स्त्री काली बिंदी को अपशकुन मानती थी... पुरुष हर रंग की बिंदी के फलसफे पर किताब लिख सकता था। स्‍पर्श की अनिवार्यता के सिद्धांत को पूरी तरह ख़ारिज करते हुए कुछ नया रचने की सोची थी। उनके बीच पांव फैलाकर निरदंद पसरे अकेलेपन को घुड़ककर भगा देने का पूरा साहस रखते हुए भी उसने पक्ष लिया था उसी का। ऐसा लगता था यहां कोई दुआ कभी काम नहीं आएगी।

वहां ज़रूरत थी एक आवाज़ की, जो अकेलेपन को निगल जाए, एक दुआ की, जो दो हिस्सों में नहीं, एक सुर में साबुत आसमान तक जाए, एक ईमानदार दुआ की, जो अधर में लटकी बाक़ी दुआओं से नज़रें बचाते हुए न चले, बल्कि पूरी सच्चाई से क़ुदरत तक पहुंच सके...

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?

23 comments:

manvinder bhimber said...

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?
ek jajbe ko itni khobsurti de di....
bahut achcha laga

Pratyaksha said...

चुप के बियाबान में आवाज़ के बूटे के बारे में सोच रही हूँ .. कोई संगीत की प्रतीक्षा कर रही हूँ ..
शायद शायदा के अगले पोस्ट में बूटा लतर बन जाये...यहाँ से आगे ..लेट द म्यूज़िक बिगिन ...

रजनी भार्गव said...

बहुत सुन्दर लिखा है.

vijaymaudgill said...

ओ तुसी चिंता न करो जी मैं लोकूंगा। बेफिकरे रहो हम हूं ना। हा हा हा
वैसे बहुत ही ख़ूबसरूत लिखा है आपने। आपने एक बहुत ज़बरदस्त कला है कि आपको एक शब्द भी दे दें, तो आप एक नावेल उस पर लिख सकती हैं। बहुत बढ़िया।

Parul said...

चुप भी खूब मुखर!!

डॉ .अनुराग said...

सुनते थे की लफ्ज़ भी मुए बोलते है ......आज देख लिया......

ashok priyaranjan said...

samvednaon ko bahut saleekey sey shabdon mein utara hai.kabhi fursat ho to meri post bhi dekhiye

मीत said...

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा?

This is surreal ... how come ?

Ek ziddi dhun said...

khoobsoorat likhti hain aap

मीनाक्षी said...

बेहद खूबसूरत ढंग से रचा गया चुप का बियाबान हमारे अन्दर ही है.. उसमें रोपे गए आवाज़ के बूटे को हमने ही पानी देना है...टूटे तारे की तरह गिरती दुआ को भी हमने खुद ही हथेलियों में लेना है.
स्त्री काली बिंदी को अपशकुन मानती थी--क्यों???

Tarun said...

चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर रोकेगा कौन?

शायदा, बहुत सुन्दर शब्दों और भावों को चनकर लिखा है ये

Udan Tashtari said...

बेहतरीन!! एक उम्दा लेखन का उत्कृष्ट नमूना!! वाह!!

Pramod Singh said...

विमल राय की एक फ़ि‍ल्‍म थी- प्रेमपत्र. शशी कपूर और साधना एक-दूसरे के हाथ में पत्र रख सकते थे, नहीं रखते, गले में स्‍टेथेस्‍कोप लगाये सर्दीली आहें भरते एक-दूसरे से नज़रें चुराते रहते हैं. मैं भी पता नहीं क्‍यों, कुछ वैसा-वैसा ही फ़ील कर रहा हूं. क्‍यों कर रहा हूं?

pallavi trivedi said...

बहुत खूबसूरत लिखा है....शब्दों का जादू इसे ही कहते हैं!

anurag vats said...

umda gadya...

ओमकार चौधरी said...

दरअसल दुआएं भी बदल गई थीं। स्त्री चुप के टूट जाने की दुआ मांगती और पुरुष उस चुप को सहन कर सकने की शक्ति मांगता, सब्र मांगता.... जबकि दुआएं थीं कि उनके भूल जाने को सज़ा देती हुई ज़मीन और आसमान के बीच किसी बादल के सफ़ेद केशों में बरसों पुराने किसी गुलाब की तरह अटकी रहती
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चुप के बियाबान में आवाज़ का बूटा रोप भी दें, तो सुबहोशाम उसे पानी कौन देगा? अनमनी उदारता के किसी क्षण में ईश्‍वर ने अगर अधर में लटकी दुआ को ज़मीन पर जाने का हुक्‍म भी दे दिया, तो तारे की तरह टूटकर गिरती उस दुआ को हथेलियां फैलाकर लोकेगा कौन?


शायदा, बहुत ही खूब सूरत लिखा है. क्या कहूं..पढ़ कर सोचने पर मजबूर हूँ. सुंदर विचार..थिंकिंग. दर्शन. एवेरी थिंग इज देअर. ऐसे ही लिखते रहें.

ravindra vyas said...

शायदाजी, आपने अपनी पहली पोस्ट से जो अपेक्षाएं मुझमें जगाईं थी वे इस पोस्ट तक बरकरार हैं। और मैं जानता हूं यह एक मुश्किल और चुनौतीभरा काम है। आप इसे ध्यानस्थ होकर कर रही हैं, यह सुखद है। कई लोग भाषा को भाषा में हासिल करने की कोशिश करते हैं और उनसे कथ्य का मर्म मर जाता है, सिर्फ शिल्प का ताबूत चमकदार दिखाई देता रहता है। मुझे कहने दीजिए आप में कथ्य और शिल्प का अनोखा मेल है हालांकि मैं यह भी जानता हूं कि अब कथ्य और शिल्प की बहर बेमानी हो चुकी है फिर भी...
मैं इसके आगे देख रहा हूं और जैसा कि प्रत्यक्षाजी ने कहा कि बूटे खिलने का इंतजार है जो लतर बन जाए...लेकिन लगता है लतर बन गई तो फिर बियाबां का मजां भी क्या?

सुभाष नीरव said...

शायदा जी, क्या कहूं ? मेरे पास तो शब्द ही नहीं हैं ! इतना उम्दा कैसे लिख लेती हैं आप ? बहुत भीतर तक उतर जाते हैं आपके शब्द…

बधाई !

Dinesh Shrinet said...

आपकी टिप्पणी के जरिए आपके ब्लाग तक पहुंचा। आपकी भाषा लगभग हतप्रभ कर देने वाली है। सुभाष जी जैसा ही मेरा हाल है। और क्या कह सकता हूं सिवाय इसके कि इसे बनाए रखें...

Vijendra S Vij said...

उम्दा लेखन , गहरी संवेदनाये..अच्छा लिखा है आपने..चुप के बियावान में भी...शब्द खामोश नहीं॥

दर्द-ए-दर्द said...

good

एस. बी. सिंह said...

रिश्तों की जमीन पर जब चुप का जंगल उगने लगे आवाज़ का बूटा लगाने की बहुत जरूरत हो जाती है।

बहुत संवेदनशीलता है आपके लेखन में। धन्यवाद

neelima sukhija arora said...

अकेलेपन को उससे ज़्यादा कोई नहीं जानता था। वे दोनों चांद की बात समझ रहे थे, लेकिन शायद वे भी अभिशप्त थे उस चुप और अकेलेपन को जीने के लिए, जिसमें हरपल गुज़र रहा था उनका।

उन दोनों का अकेलापन उनका अपना ही तो बोया हुआ था। फिर क्या था जो दोनों को साथ बांधे हुआ था।